एक खोज ! इतिहास के कदमों की
*शारदा विहार की खूबसूरत बावड़ी*जीवाजी विश्वविद्यालय की उच्च न्यायालय की तरफ वाली सड़क से निकलते हुए कल इच्छा हुई कि शारदा विहार की उस खूबसूरत बावड़ी को एक बार और देख लूँ इस से पहले की वो 'विकास' की भेंट चढ़ जाए
यह खूबसूरत बावड़ी कॉलोनी के बीचों बीच मौजूद एक पार्क में, या यह भी कह सकते हैं की यह कॉलोनी इस बावड़ी के चारों और ही धीरे धीरे अस्तित्व में आई होगी।।।।।। आलीशान घरों के बीच बनी हुई ये गुमनाम बावड़ी खुद में एक खामोश इतिहास की गवाह है।
इस बावड़ी का स्थापत्य सिंधिया कालीन ग्वालियर की अन्य इमारतों की ही तरह पत्थर के सुंदर काम से आच्छादित है। इसमें बने हुए सुंदर कंगूरे और छज्जे नदी गेट पर स्थित सिंधिया इमारत से मिलते जुलते हैं। बहुत ढूँढने पर भी हमे वहाँ किसी भी प्रकार का कोई समकालीन अभिलेख या अन्य कोई चिन्ह प्राप्त नही हो सका जिससे इस भव्य ऐतिहासिक बावड़ी के इतिहास पर कुछ प्रकाश पड़ सके, या यह ही पता चल सके कि इसे कब और किसने बनवाया।
यह इमारत ग्वालियर की अन्य समकालीन स्मारकों की तरह ही स्थानीय पीले बलुआ पत्थर से निर्मित है। हर्ष का विषय है कि इस ऐतिहासिक स्मारक के महत्व को समझते हुए अभी २-३ वर्ष पूर्व ही प्रशासन द्वारा इस बावड़ी में संरक्षण एवं सौंदर्यीकरण का कुछ कार्य हुआ है साथ ही उस पार्क मे भी कुछ विकास कार्य हुआ है जिसमे यह स्थित है।
मैंने जैसा प्रथम बार इसे देखा था उस से तो स्थिति अभी कुछ बेहतर है। प्रशासन द्वारा पत्थर से ही बावड़ी की बाउंड्री वॉल बना दी गयी है, और अच्छा होता अगर गुलाबी की जगह स्थानीय पीला बलुआ पत्थर ही इस्तेमाल किया जाता और इसके यथार्थ स्वरूप को बरकरार रखा जाता।।।।।। प्रशासन से आग्रह है कि पुनरोद्धार के बाद भी बराबर इस तरह के स्मारकों के मेंटेनेंस पर भी ध्यान दिया जाए । अभी देखने पर जिस पार्क में यह बावड़ी बनी हुई है वहाँ यत्र तत्र गंदगी पड़ी हुई है, नवनिर्मित दीवारों के पत्थर निकल रहे हैं, मलबा इकट्ठा हो रहा है, पेंट की गयी दीवारों से पपड़ी निकल रही है। इस स्थिति को अभी भी सुधारा जा सकता है अगर स्थानीय रहवासियों का सहयोग भी प्रशासन को प्राप्त हो।
बावड़ी में नीचे जाने के लिए लगभग ३०-३५ सीढी़यां उतरकर जाना पड़ता है जहाँ अभी पानी की जगह मलबा और कूड़ा कचरा भरा हुआ है। अंदाज़न यह लगभग १३० फुट गहरी है और कुएं के मुँह की तरफ ऊपर की और ३-४ पीपल के बड़े-बड़े पेड़ उसकी दीवार से ही निकल रहे हैं जिसकी जड़ें लगभग १५० साल पुरानी ईंटों की दीवार को और कमज़ोर कर रही हैं।
यदि किसी भी सज्जन के पास इस बावड़ी के इतिहास से संबंधित कोई भी जानकारी है तो कृपया साझा करें।
इस बावड़ी को देखकर याद आती है दिल्ली की वो प्रसिद्ध अग्रसेन की बावड़ी जिससे यह किसी भी रूप में कमतर नहीं है, कमी है तो बस थोड़े से स्थानीय सहयोग और जागरूकता की जिससे इस ऐतिहासिक स्मारक का खोया हुआ वैभव पुनः लौटाया जा सके।
कुछ चित्र भी साथ में संलग्न हैं। आनंद लीजिये..






